Tuesday, November 8, 2011

भावना

मैं जानकर इंसान को क्यों जानना चाहती नहीं,
जो सत्य है उस सत्य को क्यों मानना चाहती नहीं
क्यों हर तरफ एक स्वार्थ का वातावरण है बन गया
क्यों मतलबी तूफ़ान में इंसान ऐसा थम गया
क्यों आँधियों में झूट की मानव ही बहने है लगा
जो था कभी जर्रा नहीं वो आज पर्वत हो गया
ऊँचाई इतनी हो चली वो आसमान में खो गया ...
मानव तो बस कहने को है एक शब्द ही ये रह गया
न भावना न प्यार है, अब तो ये सब कुछ खो गया
क्यों मोह को, स्नेह को त्यागा है तुने ये बता
क्यों देव से अब दैव कहलाता है, अब कुछ न छुपा
क्यों कब तलक ये सिलसिला चलता रहेगा न बढ्हा
अब छोड़ तू जिद्द छोड़ दे क्यों कर रहा दुनिया तबाह
अब छोड़ दे जिद्द छोड़ दे क्यों कर रहा दुनिया तबाह....

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