Wednesday, January 25, 2012

द्वंध

आज एक शंखनाद सा गूंजा हृदय में
और हम
छटपटा के रह गए.
क्या हुआ और क्या होना चाहिए था
इन विचारो में
हम कुछ भी न सोच पाए 
और आखिरकार 
हम फिर से उसी 
दोराहे पर ही पहुँच पाए
जहाँ से हमने सफ़र
अपना शुरू किया था कभी.......... 

Wednesday, November 16, 2011

फिर से ....

जाने क्यों हर रिश्ता झूठा लगता है,
सब ठीक है लेकिन कुछ तो टूटा लगता है,
जीवन की हर डोरी सच्ची लगती है,
फिर भी इसको जीना झूठा लगता है,
तुम बिन मुझको हर पल जीना पड़ता है,
हंस कर इस  गम को भी पीना पड़ता है,
साथ तो हो तुम मेरे लेकिन क्यों कर मुझको,
हाथ तुम्हारा मुझसे छूटा लगता है....
सब ठीक है लेकिन कुछ तो टूटा लगता है..
कितना अरसा बीत चुका उस मंज़र को,
पर कौन समझ सका है वक़्त के खंज़र को,
रूठ चुके है सारे रिश्ते जैसे अब,
प्यार हमारा जबसे रूठा लगता है...
सब ठीक है लेकिन कुछ तो टूटा लगता है...
जाने क्यों हर रिश्ता झूठा लगता है....

Monday, November 14, 2011

प्रभाव

मैं अपने अनुभव के मोतियों को शब्दों के धागों में पिरो कर
कविता का हार लाई हूँ
तुम्हारी आहटों से भरी धुंद में बस तुम्हारे लिए ही
मेरा प्यार लाई हूँ
अपने इस अंतर्मन से, बस तेरे ही भोलेपन से
तुम्हारे मेरे जीवन से, सौंधी सी माटी की खूसबू
अधिक नहीं पर जार जार लाई हूँ
मैं अपने अनुभव के .............................
तुमसे ही प्रभावित होकर, तुम्हे ही अपना आदर्श कहकर
तेरे कोमल कोमल शब्दों के बाणों से प्रभावित होकर
तेरी कविताओं के उद्देश्य को अपने जीवन में उतार लाई हूँ
अपने अनुभव के मोतियों को.......................................
जैसे तुने मुझको जाना, वैसे ही तुझको समझकर
तेरे ही आदर्शों पर चलकर, कभी बिंदु बिंदु बिखरकर
तुझे दुनिया वालो का कहकर बस तेरे ही पथ पर बहकर
तेरे और मेरे अमर प्रेम की, नय्या को पार लाई हूँ
अपने अनुभव के मोतियों को शब्दों के धागे में पिरोकर
कविता का हार लाई हूँ

Tuesday, November 8, 2011

भावना

मैं जानकर इंसान को क्यों जानना चाहती नहीं,
जो सत्य है उस सत्य को क्यों मानना चाहती नहीं
क्यों हर तरफ एक स्वार्थ का वातावरण है बन गया
क्यों मतलबी तूफ़ान में इंसान ऐसा थम गया
क्यों आँधियों में झूट की मानव ही बहने है लगा
जो था कभी जर्रा नहीं वो आज पर्वत हो गया
ऊँचाई इतनी हो चली वो आसमान में खो गया ...
मानव तो बस कहने को है एक शब्द ही ये रह गया
न भावना न प्यार है, अब तो ये सब कुछ खो गया
क्यों मोह को, स्नेह को त्यागा है तुने ये बता
क्यों देव से अब दैव कहलाता है, अब कुछ न छुपा
क्यों कब तलक ये सिलसिला चलता रहेगा न बढ्हा
अब छोड़ तू जिद्द छोड़ दे क्यों कर रहा दुनिया तबाह
अब छोड़ दे जिद्द छोड़ दे क्यों कर रहा दुनिया तबाह....

Friday, November 4, 2011

जाने कब

कुछ साकार करने की तमन्ना लिए जब जब भी वो राह ढूँढती है,
राह  खो जाती है
उसकी जिंदगी में एक और नई अनहोनी हो जाती है
पर वो हताश नहीं होती निराश नहीं होती,
फिर ये कल्पना लड़खड़ाते कदमों पर खुद को उठाती है,
खुद ही खुद को हिम्मत देती है, एक नई राह खोजती है, अपनी जीत सोचती है
कई बार यूँ ही होता है,
कई बार राहें खो जाती है,
कई निराशाएं सामने आती है,
कल्पना को पल पल डरती है, सताती है,
पर कल्पना नहीं डरती, खुद ही खुद से लडती है,
कई लम्हा हकीक़त की शूली पर चढ़ती है,
कितनी ही दुविधाओं में पड़ती है, उसकी आत्मा रोती है, करहाती है,
पर कल्पना फिर भी एक नया सपना सजाती है,
नई आशा लिए,
उस सपने को पूरा करने की तमन्ना लिए,
भगवान् उसे बार बार सजा देता है,
उसकी नासमझियों का हिसाब लेता है,
पर वो दुखी होकर भी उसे ही सच्चा कहती है, 
उसके हर फैसले को अच्छा कहती है,
एक बार फिर से वो सपना देख रही है,
कुछ समेट रही है,
ये सोचकर की अब तो नासमझियों का हिसाब पूरा हो गया होगा,
कांच पूरा का पूरा चूरा चूरा हो गया होगा  
और उसी चूरे से कुछ दीवारें सपनो की फिर से बनाती है,
सपनो की एक नई कल्पना सजाती है,
फिर से वो नई कल्पना में खो जाती है, खाबों को सजाती है......
पर जाने कब इन्हें सच कर पाती है,
जाने कब ये कल्पना पूरी हो पाती है ........
जाने कब????

Sunday, October 9, 2011

जाने क्यूँ

कभी कभी मैं बहुत अकेली हो जाती हूँ,
ना जाने कहाँ किस भंवर में तनहाइयों के साथ
अपने को भी तनहा पाती हूँ!
और तब मैं सोचती हूँ की तनहाइयाँ आखिर मुझे
कब तक सता पाएंगी?
कभी ना कभी शायद ये भी मुझसे
तुम्हारी तरह ही रूठ जाएँगी!
बस तुम्हारे बारे में ही मैं क्या कहूं
मुझसे तो सभी रूठ जाते है
कई पल कई लम्हे जो संजोती हूँ मैं
एक कतार में मुझसे छूट जाते है,
जिसे भी अपना कहती हूँ वो मुझे
बेगाना कर देता है!
मेरी हकीक़त भरी जिंदगी के जज्बातों को
एक अफसाना कर देता है!
शायद तुम सही हो, लेकिन मुझे इस कदर
फिर से अफसाना ना बनाओ
मेरी जज्बातों की महफ़िल को,
एक जलता हुआ शामियाना ना बनाओ!
शायद मैं गलत हूँ लेकिन, तुम्हारी नज़रों में
मुझे जिदगी का एक कोरा पन्ना ना बनाओ,
मैं हसरतों भरी धड़कन हूँ, मुझे तुम्हारे जीवन की अधूरी
तमन्ना ना बनाओ,
अधूरी तमन्ना ना बनाओ.............


Tuesday, September 20, 2011

कांच की दीवार

तकदीर मेरे संग बार बार ये कैसा खेल खेलती है,
एक कांच की दीवार बार बार जाने कैसे कैसे आघात झेलती है,

अतीत में खोई हुई एक परछाई उभर आई थी,
मैंने कई रंगों से उसकी तस्वीर सजाई थी,
कुछ पलों में ही अनगिनत ख्वाब संजो दिए थे,
और सोचा जिंदगी में ख़ुशी हकीक़त बन आयी थी,
फिर पल पल सिर्फ ख्वाब थे, कदम कदम पर मुस्कराहट  होटों पर दस्तक देने लगी थी,
आँखों में चमक बिखेरने लगी थी, आत्मविश्वास की नय्या खेने लगी थी,
चारो तरफ सिर्फ फूलों के गलियारे थे, परछाई के संग संग चाँद और सितारे थे,
सारे के सारे अधिकार उन पलों में परछाई पर हमारे थे,
दुनिया में अपनी बड़ी खुशनसीबी का एहसास होता था,
आँखों के सामने अपनी नवीन कल्पनाओं का आकाश होता था,
परछाई की हकीक़त में मोजूदगी का एहसास होता था,
पर वर्तमान फिर से अतीत बन गया,
उभर आयी परछाई फिर से खो गई,
तकदीर फिर से नया खेल खेल गई,
एक बार फिर से कांच की दीवार बहुत बड़ा आघात झेल गई,

पर इस बार कांच की दीवार चूर चूर हो गई,
मैं उस चूरे से खेलने लगी पर नहीं जानती थी की कांच 
के टुकडो से खेला नहीं जाता,अब मैं लहुलुहान हूँ,
उन टुकड़ों को समेटने की जिद्द है लेकिन मैं लहुलुहान हूँ,
टुकड़ों बिखर चुके है और मैं लहुलुहान हूँ.