Wednesday, August 24, 2011

अनभिज्ञ

इस युग का अदि अंत नहीं मैं जानती हूँ,
क्यूँ  शुन्य है अनंत नहीं मैं जानती हूँ
मैं जानती हूँ बस इतनी सी बात
कि आम के एक पेड़ पर बैठा है पंछी
एक गिद्ध है आकाश में उस पर लगाये घात

क्यूँ ऐसी नीयत हो गई है इंसान कि भी आज
मैं सोचती हूँ अक्सर जो था कभी देवता
वो बन गया क्यूँ बाज़

कुछ तो फर्क है मनुष्य तुझमें और बाज़ में
तू क्यूँ अंतर समझा नहीं सकता कल और आज में

तेरा अदि अंत के दलदल में इतना क्यों धंस गया है
तू माया के इस जाल में क्यों जटिलता से फंस गया है

तेरे कण कण से यही आवाज़ आती है मुझे
इस नवयुग कि  आंधी में खो गया जाने कहाँ मेरा कल गया है, 
आज मेरी नस नस का लहू  समय कि चिंगारियों से जल गया है!     

मैं

मैं अनजानी सी राहों में , कुछ भूली भटकी राहों सी
कुछ सहमी सहमी रातों सी, कुछ घबरायी सी बातों सी
हूँ तो मैं बहुत साधारण सी , फिर भी उलझे जज्बातों सी
कह दूं तो अथाह सागर हूँ, चुप रहूँ तो टूटती सासों सी
चुप रहूँ , तो टूटती सासों सी

Thursday, August 4, 2011

अधूरे ख्वाब

मेरे हर एक सपने को जैसे किसी की नज़र लग जाती है,
मैं उन्हें संजोती हूँ बार बार , पर आखिरकार मेरे हाथ में सिर्फ हार ही आती है!

सपने बुनते बुनते मैं भूल जाती हूँ की वो सपने है,
हकीकत तब जान पाती हूँ, जब कोई मेरे टूटे सपनो से खेलता है,
जब उनके रंगो को मेरे मन के आंगन में बिखेरता है!

मैं सिर्फ उन रंगो में अतीत की परछाइयां तलाश करती हूँ,
अपने आप से ही अक्सर सवाल जवाब करती हूँ , कि क्यूँ'
मैं एक सपना टूटने के बाद फिर से ख्वाब बुनती हूँ,
जबकि मैं जानती हूँ कि ये ख्वाब भी शायद टूट जायेगा,
और मुझे फिर से बहुत रुलाएगा, तड्पाएगा

लेकिन अब मैं कोई ख्वाब नहीं देखना चाहती !
फिर से बिखरे रंगो को नहीं बटोरना चाहती,
नहीं देना चाहती किसी को अधिकार कि वो मेरे ख्वाबो से खेल सके,
मुझे अतीत के अन्धकार में धकेल सके,
जहाँ फिर से मैं अपने टूटे ख्वाबो के साथ अकेली हो जाऊं,
जहाँ से मुझे आगे अँधेरा ही अँधेरा नज़र आये
और मैं फिर से उन्ही अनजानी राहो में खो जाऊं!

नहीं देखना चाहती मैं कोई ख्वाब , नहीं देखना चाहती...
अधूरे ख्वाब